आंकडे झूठ नहीं बोलते है, यहाँ भी ऐसा ही है, आंकडे कुछ और ही बता रहे है, किन्तु भारत में आज कल आंकड़ों को भी ताक पर रख स्वयं की धारणा व् चाटुकारिता निर्वाह का उत्तरदायित्व सत्य के ज्यादा बड़ा और महत्वपूर्ण है।
इन आंकड़ो से सिद्ध यह होता है की भाजपा में विजय-उल्लास नहीं, उत्तर प्रदेश की इस करारी हार पर गहन आत्मचिंतन व् आत्मबोध की आवश्यकता है।
उत्तर प्रदेश के निकाय चुनावों में भाजपा को मिली जीत पर, मीडिया व् भाजपा में
योगी श्री आदित्यनाथ जी की भूरी भूरी प्रशंसा हो रही है।
मुख्यमंत्री श्री योगी ने स्वयं इस विजय का श्रेय जनता, कार्यकर्त्ता, व्
प्रधानमंत्री मोदी की दूरदर्शी नीतियों व् अमित शाह जी की संगठनात्मक रणनीति
को दिया है।
यदि देखा जाए तो यह एक प्रकार से ठीक भी है, जनता ने अपने मताधिकार के प्रयोग
करते क्षण प्रधान मंत्री मोदी जी की नीतियों को अवश्य ध्यान में रखा।
यही कारण है, की भाजपा को इस निकट चुनाव में जीत नहीं करारी हार का सामना करना
पडा है।
किन्तु यह मीडिया जनित कर्कश कोलाहल जिसे भारतीय जनता पार्टी की भव्य विजय की
रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, वह नितांत असत्य है।
विजय गान – भाजपा की ताल व् मीडिया के कोलाहल में दबी जनता की तान
आंकडे झूठ नहीं बोलते है, यहाँ भी ऐसा ही है, आंकडे कुछ और ही बता रहे है,
किन्तु भारत में आज कल आंकड़ों को भी ताक पर रख स्वयं की धारणा व् चाटुकारिता
निर्वाह का उत्तरदायित्व सत्य के ज्यादा बड़ा और महत्वपूर्ण है।
इन आंकड़ो से सिद्ध यह होता है की भाजपा में विजय-उल्लास नहीं, उत्तर प्रदेश की
इस करारी हार पर गहन आत्मचिंतन व् आत्मबोध की आवश्यकता है।
महापौर के १६ सीटो में से १४ भाजपा के झोली में गिरी। नगर पंचायत मे कुल ४३८
पदों मे भाजपा को १०० नगर पंचयत अध्यक्ष के पद ही मिल पाये, बाकी ३३८ पद गैर
भाजपा दल व निर्दलियों ने झटके।
नगर पंचायत के ५४३४ सदस्यों के लिए भाजपा को ६६४ पदों पर ही संतोष करना पडा
किन्तु वहीं गैर भाजपाई दल व् निर्दलियों ने ८८ प्रतिशत सीटो पर, यानि ४७७०
पदों पर विजय पाई।
नगर पालिका परिषद अध्यक्ष के चुनावों में १९८ पदों में से भाजपा को मात्र ७०
पदों पर ही संतोष करना पडा, वहीं अन्य दलों को ६४.५% यानि १२८ पदों पर जीत
प्राप्त हुई।
नगर पालिका परिषद् की ५२६१ सदस्यों की पदों पर भाजपा को ९२२ सीटों पर विजय
प्राप्त हुयी किन्तु गैर भाजपा व् निर्दलियों ने ४३३९ पदों पर विजय प्राप्त
करी।
यानि, भाजपाई और मीडिया दिन को रात बनाने में प्रयासरत हैं। इन आंकड़ो का
अवलोकन स्वयं दूध का दूध व पानी का पानी कर देता है। किन्तु दाद देनी पडेगी
धृष्ट भारतीय मीडिया की जो अपने स्वामी सेवा में कर्तव्य बोध की तिलांजलि
स्वेच्छा से दे दी।
विजयोत्सव उपरान्त भाजपा में आत्ममंथन
किन्तु इस जनादेश से विजय उत्सव तो उपरी तौर पर तो भाजपा मना ही रही है,
किन्तु सुदूर नागपुर व् भाजपा के संगठनात्मक वरिष्ठ पदाकारियों में गहन
आत्ममंथन व आत्म शोध चल रहा है।
जनता ने प्रधान मंत्री मोदी जी की नीतियों को सिरे से नकार दिया है।
उत्तर प्रदेश में योगी सरकार को विरासत में अराजकता, नियम-विस्र्द्धी व् भारत
की सबसे ज्यादा निष्क्रिय व् भ्रष्ट नौकरशाही, खंडित व्यवस्था व् तंत्र
प्रणाली मिली।
उनसे अल्प काल मे ही यह सब सुधारने की अपेक्षा कुछ सीमा तक ही की जा सकती है।
जनता ने अपना मत मोदी जी अनियोजित व् आकस्मिक नोटबंदी व् जी-एस-टी के
अव्यवस्थित कार्यान्वयन पर दिया है।
चाहे कृषि उद्योग हो, या फिर नौकरी के अवसर, सभी जगह मायूसी है। इन्ही सब का
प्रतिफल है की भाजपा को जनता ने निकाय चुनाव में धूल चटा दी।
जीत कि परिभाषा यह तो हार का प्रारूप कैसा?
बात बासपा के अचानक बढ़ जाने कि नहीं है, न् ही काँग्रेस के न् जीत पाने कि है,
जितने निर्दलीय जीते है, उससे यह सिद्ध होता हैं कि जनता का विश्वास स्थापित
राजनैतिक दलों मे नहीं रहा।
स्थापित दलों कि बात यदि छोडे, तो निष्कर्ष निकलता है की निर्दलीय जीते, आम
आदमी पार्टी जीती। भाजपा बुरी तरह हारी।
यदि इन निकाय चुनावों के नतीजों को भाजपा जीत मान रही हैं, तो हार का प्रारूप
क्या होगा?
भाजपा की इष्टदेव ई-वी-एम की अनुकम्पा
गुजरात के चुनाव हैं, भाजपा का सहारा उनके इष्टदेव, व् कुलदेवता ई-वी-एम् है,
न की प्रधान मंत्री श्री मोदी जी के करिश्माई नेतृत्व है।
जब तक भाजपा पर ई-वी-एम् देवता की कृपा है, व् पिंजरे में एक नितांत अशक्त
चुनाव आयोग बंदी है, व् पक्षपाती मीडिया हैं, तब तक, न हार्दिक पटेल की
राजनैतिक सभा पर जुटे पाटीदार या फिर राहुल गाँधी जी की सभाओं में जुटी भीड़ भी
भाजपा को हरा नहीं सकती।
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