AGRICULTURE : The Dangerous Agricultural Games Being Played On Indian Farmland
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जब वैश्विक अर्थव्यवस्था घोर उथल पथल का सामना कर रही थी, भारत को उस संकट कि स्थिति से सुरक्षापूर्वक निकालने में भारतीय आर्थिक संस्थाओं की रूढ़िवादी व तर्कसंगत नीतियों का हाथ था|
भारत की अर्थव्यवस्था की इस स्थिरता का श्रेय प्रमुखता से भारतीय रिजर्व बैंक को जाता है| भारतीय रिजर्व बैंक की साख विश्व स्तर पर अति सम्मानीय है, और इसको बनते बनते ७० वर्ष लगे हैं|
जब इंदिरा गांधी ने आपातकाल घोषित किया था तब भी, जहाँ सभी सरकारी संस्थाए पर सरकार का हस्तक्षेप था, किन्तु भारतीय रिज़र्व बैंक पर प्रकट व् प्रत्यक्ष रूप से नैतिक बाध्यता नहीं थी|प्रधानमंत्री मोदी जी की कार्य शैली विचित्र है| इसमेँ भारतीय जनता पार्टी की राजनैतिक विचारधारा, या यह कह लें, प्रधान मंत्री मोदी जी की विचार प्रक्रिया के अनुकूल बहने की लेशमात्र भी गुन्जायिश नहीं है| सरकारी संस्था व राजनैतिक विचारधारा का सहअस्तित्व प्रथम मंत्री पण्डित नेहरूजी के समय तो संभव था किन्तु प्रधान सेवक मोदी संभव नहीं है|
भारतीय रिसर्व बैंक के राज्यपाल श्री उर्जित पटेल, भारतीय जनता पार्टी व उसके अन्य संगठन द्वारा उनकी कार्य शैली और भारतीय रिसर्व बैंक की स्वायत्ता पर हस्तक्षेप के चलते जहाँ अपना डोरी डंडा बटोरने की ताक मे हैं, वहीं भारतीय रिजर्व बैंक की साख धूमिल हुई हैं|
वित्त मंत्री अरुण जेटली जी, जो कि एक वकील हैं, जिनकी वित्तीय शिक्षा उर्कित पटेल के ज्यादा नहीं हैं, उनका मानना हैं कि देश का पंद्रह हज़ार करोड़ ऋण संकट पर उपयुक्त कदम नहीं उठाये|
अब तो रिज़र्व बैक के अधिकारी भी बँट गये..
— punya prasun bajpai (@ppbajpai) October 31, 2018
कुछ दिन पहले ही सीबीआई को देश ने बँटते देखा..
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट को भी देश ने बँटते देखा..
नागरिकों को जाति/धर्म के नाम पर तो पहले ही बाँटा जा चुका है...
....और बॉंटने के दौर में "स्टैच्यू अॉफ यूनिटी" का लोकार्पण हो गया
जानकारों का मानना है, श्री मोदी की सरकार २०१९ के लोकसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए और अपनी बुरी नीतियों को छुपाने के लिये भारतीय रिज़र्व बैंक पर अपना प्रभाव डालना चाह रही हैं| इस संस्थान में पारदर्शिता बनी रहे व् वह स्वतंत्र रूप से कार्य करता रहे इस पर मोदी सरकार का विश्वास नहीं हैं| २०१९ तक मोदी जी की राजनैतिक प्रतिष्ठा बनी रहे चाहे भारतीय सरकारी संस्थनो की साख जाती रहे|
जो बैंक राज्य स्तर पर है, उदाहरण के लिए - पंजाब नेशनल बैंक, ऐसे बैंकों पर भारतीय रिज़र्व बैंक ने उद्योग घरानों को दी जाने वाली उधार प्रक्रिया पर सख्ती की है|
यह इसलिये की जो छोटे व् मध्यम खाताधारक व् निवेशक है, उनका महनत का पैसा सख्त नियम के अंतर्गत ही उधार दिया जाए, ताकि चुकता करने में यह उद्योग घराने आनाकानी न करे और, नीरव मोदी, विजय माल्या सरीखे भगोडे जनता का धन ले कर चम्पत न हो जाएँ|
मोदी जी व् उनके सलाहकार चाहते हैं की इस प्रकार के प्रतिबंधों की कोई आवश्यकता नहीं हैं, तथा राज्य स्तर पर बैंक इन नियमों को ताक में रख अपनी तिजोरी खोल दें | यह रिज़र्व बैंक को स्वीकार्य नहीं है| इसके चलते उर्जित पटेल मोदी सरकार को स्वीकार्य नहीं|
न सिर्फ यह, आमतौर पर आवास विकास व बुनियादी ढांचे का वित्तपोषण जो गैर बैंकिंग वित्तीय संस्थाए, (जिसे एन.बी.एफ.सी) करती हैं, और जो अपनी स्वयं की विनाशकारी नीतियां के चलते दिवालिया होने के कगार पर है, या फिर दिवालिया हो चुके हैं, ऐसे संस्थानों को भी मोदी सरकार चाहती है की भारतीय रिज़र्व बैंक छोटे व् माध्यम निवेशकों की जो खरबों डॉलर की संपत्ति है बैंकों मे है, इन संस्थाओं को सहज ही तरीके से ऋण प्रदान करें व इनको दिवालिया होने से जनता के पैसों से बचा लिए जाय |
भारतीय रिसर्व बैंक जानता हैं कि ऐसा कोई भी कदम भारत को एक अभूतपूर्ण आर्थिक संकट मे धकेल देगा| किन्तु प्रधान सेवक को कौन समझाए? उनको २०१९ का लोक सभा चुनाव व अपने पूंजीपति मित्र नज़र आ रहे हैं|
रिसर्व बैंक के उपराज्यपाल श्री विरल आचार्य जी ने २०१० मे अर्जेंटीना के केंद्रीय बैंक मे उत्पन्न आर्थिक संकट की याद दिलाई, और सरकार को उससे सीख लेने की गुहार लगाई और कहा की रिसर्व बैंक जैसी "अति महत्वपूर्ण नियामक संस्था को कमजोर न होने दिया जाये।"
भारतीय उद्योग परिसंघ ने भी श्री मोदी के तेज प्रताप से विचलित हो अपनी आँख पर पट्टी बंधते हुए मोदी राग अलापा, "भारतीय रिजर्व बैंक को पूरे वित्तीय क्षेत्र के हित में हस्तक्षेप करना आवश्यक है।" कोई रिज़र्व बैंक को हठीला मानता है तो किसी का कहना है की भारतीय रिजर्व बैंक को सरकार की कही करना चाहिए| ऐसा अभूतपूर्व राजनीतिक दबाव आज तक किसी भी प्रधान मंत्री के काल में नहीं रहा जितना श्री मोदी के कार्यकाल मे हो रहा है|
याद रहे, पिछले पिछले रिसर्व बैंक के गवर्नर श्री रघुराम राजन ने बड़े पूंजीपतियों के विरुद्ध उधार चुकाने की एक मुहिम चलायी थी| नतीजा यह रहा कि अत्यधिक राजनैतिक दबाव में चलते उन्होंने अपनी अवधी का विस्तार नहीं लेने का फैसला किया और वापस अमरीका जा कर पठन-पाठन मे लग गए| उधार तो वापस नहीं आया, वे वापस चले गए| श्रीमान अरुण जेटली जी का रघुराम राजन जी का अमरीका वापसी मे हाथ माना जाता है|
किन्तु उर्जित पटेल को हटाने का वक़्त अभी ठीक नहीं हैं| दिसम्बर आते आते तो बिलकुल भी नही| ऐसा करने पर मोदी जी की छवि धूमिल हो जायगी और उसको सुधारने में २०१९ का चुनाव हाथ से निकला सकता है| भारतीय जनता नोटबंदी को अभी भी याद रखे हैं|
Amit Vats from New Delhi
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